शनिवार, 26 मार्च 2011

आखिर टूट ही गई कांग्रेस-द्रमुक की दोस्ती

2जी स्पेक्ट्रम की जांच ही असली कारण
ओ.पी. पाल
आखिर बहुचर्चित 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला कांग्रेस और द्रमुक के बीच दीवार खड़ी कर ही गया। यूपीए से द्रमुक का समर्थन वापसी का ऐलान तमिलनाडु विधानसभा चुनावी गठबंधन तो मात्र एक बहाना है, जबकि असली कारण ए. राजा और द्रमुक के अन्य नेताओं पर जांच का कसता जा रहा शिकंजा माना जा रहा है। कांग्रेस व द्रमुक के बीच दोस्ती में दरार तो पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा के 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मुद्दे पर इस्तीफा देते ही पड़नी शुरू हो गई थी, जिसके बाद इन दोनों दलों की दोस्ती पर संशय के बादल मंडरा रहे थे, जो यूपीए से समर्थन वापसी की घोषणा होते ही तमिलनाडु में कांग्रेस की राजनीति संकट के चक्रव्यूह में फंसती नजर आने लगी। हालांकि द्रमुक के इस निर्णय से केंद्र सरकार संकट में आ गई हो ऐसी भी संभावना नहीं है।
केंद्रीय निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में देश के पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा की है जिसमें कांग्रेस और द्रमुक के बीच सीटों के तालमेल को लेकर बात नहीं बन सकी। तमिलनाडु में कांग्रेस 243 विधानसभा सीटों में 63 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करना चाहती थी, लेकिन कांग्रेस को 60 सीटे देने के लिए द्रमुक तैयार थी, जिससे महासचिव प्रभारी गुलामनबी आजाद को भी अवगत करा दिया गया था। तीन सीटों को लेकर बिगड़ी दोस्ती इस बात का संकेत कर रही है कि यह तो एक बहाना है। असली वजह 2जी स्पेक्ट्रम मामले पर द्रमुक नेताओं पर जांच एजेंसियों के कसते जा रहे शिकंजे माना जा रहा है। वैसे तमिलनाडु में सत्ताधारी द्रविड मुनेत्र कड़गम यानि द्रमुक जो 2जी स्पेक्ट्रम मामले में ए. राजा को लेकर कांग्रेस से दोस्ती को लेकर असमंजस में थी। शायद इसी बहाने द्रमुक ने कांग्रेस के रवैये से क्षुब्ध होकर यूपीए सरकार से अपना समर्थन लेना बेहतर समझा। कांग्रेस से दोस्ती को लेकर चल रही अटकलें आखिर शनिवार को चेन्नई में द्रमुक की हुई बैठक में यूपीए से समर्थन वापस करने के निर्णय से समाप्त हो गई हैं। द्रमुक प्रमुख एम. करुणानिधि 2जी स्पेक्ट्रम मुद्दे पर चल रही जांचों के चक्रव्यूह को लेकर पहले से ही कांग्रेस के रवैये से खफा दिखाई दे रहे थे, जिसमें ए. राजा को जेल तक जाना पड़ा। ऐसी स्थिति में कांग्रेस भी धर्म संकट में फंसी हुई है, हालांकि द्रमुक के यूपीए से समर्थन वापस लेने से केंद्र की यूपीए सरकार को कोई खतरा नजर नहीं आता। यदि सरकार पर संकट भी मंडराया तो उस पर समाजवादी पार्टी भी नजरें रखे हुए हैं यानि वह यूपीए को समर्थन देने को तत्पर दिखाई दे रहे हैं। द्रमुक से केंद्र व तमिलनाडु में गठबंधन को लेकर कांग्रेस निश्चित, लेकिन असमंजस में ही दिखाई दे रही थी। हालांकि इससे पहले तमिलनाडु के दौरे पर जा चुके प्रधानमंत्री भी इस बात को कह चुके थे कि कांग्रेस और द्रमुक की दोस्ती अटूट है, वहीं शनिवार को ही जब चेन्नई में करूनाधि की अध्यक्षता में तमिलनाडु चुनाव में कांग्रेस के साथ गठबंधन के मुद्दे पर द्रमुक की बैठक चल रही थी तो तमिलनाडु के कांग्रेस में प्रभारी महासचिव और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलामनबी आजाद ने कहा कि तमिलनाडु में सीटों के बंटवारे को लेकर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के साथ बातचीत जारी है और आशा है कि डीएमके गठबंधन नहीं तोड़ेगी। इसके विपरीत कांग्रेस द्वारा गठबंधन में केवल तीन सीटे अधिक मांगना अनुचित करार देते हुए द्रमुक ने कांगे्रस से गठबंधन न करने का निर्णय लेकर कांग्रेस की राजनीति को संकट में डाल दिया है। गौरतलब है कि तमिलनाडु में चुनावी समीकरण को देखते हुए करुणानिधि ने कांग्रेस से कहा था कि अन्य पार्टियों को सीटें आवंटित करने के बाद बाकी बची सीटों को कांग्रेस और डीएमके के बीच बांट दिया जाएगा। इस आधार पर कांग्रेस को 51 सीटें मिल सकती हैं। लेकिन चूंकि कांग्रेस अधिक सीटें चाहती थी, लिहाजा उन्होंने कांग्रेस के लिए सीटों की संख्या पहले 53, उसके बाद 55, फिर 58 और अंत में 60 बढ़ा दी। द्रमुक ने इस निर्णय से कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद को भी अवगत करा दिया गया था। दूसरी और कांग्रेस भी डीएमके द्वारा अन्य छोटी पार्टियों को मनमाने तरीके से सीटें आवंटित किए जाने को लेकर खिन्न थी। डीएमके ने 52 सीटें देकर पांच पार्टियों के साथ चुनावी गठबंधन किया है। इनमें केएमके (7), एमएमके (1), वीसीके (10), पीएमके (31) और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (3) शामिल हैं। कांग्रेस को 60 सीटें देने के बाद डीएमके के पास अपने लिए मात्र 122 सीटें ही बच रही थी। यदि वह कांग्रेस को 63 सीटें दे देती है तो डीएमके के पास 119 सीटें ही बचती हैं, जो कि 234 सदस्यीय विधानसभा की आधी संख्या से मात्र दो सीट अधिक है। लिहाजा द्रमुक ने कांग्रेस से गठबंधन न करने का फैसला करके तमिलनाडु में कांग्रेस के लिए संकट पैदा कर दिया है।

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