शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

अब जाट वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर

ओ.पी. पाल
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अल्पसंख्यक मतदाताओं को साढ़े चार प्रतिशत आरक्षण लॉलीपॉप पकड़ाकर कांग्रेस ने अब जाट वोट बैंक पर निशाना साध लिया है। यूपीए के ताजा सहयोगी बने राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख चौधरी अजित सिंह के जरिये यह मुद्दा गृह मंत्रालय तक पहुंचा भी दिया है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावी महासमर के लिए एक जुट हुए रालोद व कांग्रेस ने अब एक सुर में केंद्रीय सेवाओं में जाटों को भी पिछड़ा वर्ग के तहत आरक्षण दिए जाने की वकालत की है, रणनीति साफ है कि उत्तर प्रदेश में मुसलिम मतदाताओं में कांग्रेस के प्रति पुराना भरोसा वापस लौटाने की कोशिश के बाद कांग्रेस चौधरी अजित सिंह के माध्यम से आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे जाटों को भी हर हाल में अपने पक्ष में करने की कोशिश शुरू कर चुकी है। चौधरी अजित सिंह के साथ कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की शुक्रवार को केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम से मुलाकात इसी रणनीति का हिस्सा है। यूपीए में शामिल होने के बाद पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह की 119वीं जयंती पर केंद्रीय नागर विमानन मंत्री बने राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख चौधरी अजित सिंह के आवास पर जुटे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा और राजस्थान के जाट नेताओं ने जाट आरक्षण को लेकर रालोद प्रमुख पर दबाव बनाया तो खासकर उत्तर प्रदेश में होने वाले आगामी विधानसभाओं के मद्देनजर रालोद के सामने जाट आरक्षण का मुद्दा सामने आया। इस मौके पर आनन-फानन में चौधरी अजित सिंह ने जाट आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे संगठनों के नेताओं को भी बुलाकर एक बैठक की और विचार विमर्श के बाद तत्काल जाट आरक्षण के मुद्दे पर केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम से डेढ़ बजे मुलाकात का समय लिया गया। इस मुद्दे पर जाट नेताओं के बढ़ते दबाव में चौधरी अजित सिंह ने कांग्रेस महासचिव एवं उत्तर प्रदेश में कांग्रेस प्रभारी दिग्विजय सिंह को भी विश्वास में लेकर इस मुद्दे को साझा करने पर बल दिया। यही कारण था कि नॉर्थ ब्लाक स्थित गृहमंत्रालय में पी. चिदंबरम के साथ हुई मुलाकात के दौरान चौधरी अजित सिंह और रालोद महासचिव जयंत चौधरी के अलावा स्वयं कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी बैठक में शामिल हुए। यही नहीं पी. चिदंबरम के साथ बैठक होने के बाद कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह भी सीधे चौधरी अजित सिंह के 12 तुगलक रोड स्थित आवास पर पहुंचे, जहां इस मुद्दे पर सरकार के जवाब का इंतजार कर रहे जाट नेताओं और उनके सैकड़ो समर्थकों को भरोसा दिलाया कि जाट आरक्षण को लेकर सरकार गंभीर है और कांग्रेस तथा रालोद जाट आरक्षण को लेकर चली आ रही मांग को पूरा कराने
और जाटों को केंद्रीय सूची में शामिल करने के लिए संकल्प किया है। आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए जाट आरक्षण के मुद्दे पर रालोद-कांग्रेस का सुर में सुर मिलाने की रणनीति को उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार द्वारा चुनावी पटरी पर जाटों की राजनीति का जवाब माना जा रहा है। वहीं रालोद के साथ गठबंधन करके कांग्रेस ने भी खासकर उत्तर प्रदेश में चौधरी अजित सिंह के सहारे ही जाटों पर भरोसा जताया है यानि जाटों के वोट कांग्रेस के खाते में भी आने की कांगे्रस को पूरी उम्मीद है।
संघर्ष समिति को झटका
जाट आरक्षण की मांग को लेकर रालोद के अलावा संघर्ष कर रहे संगठनों को भी कांग्रेस व रालोद ने झटका दिया है जो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के कंधे पर बंदूक रखकर जाट आरक्षण की राजनीति करने का प्रयास कर रहे हैं। रालोद प्रमुख चौधरी अजित सिंह ने जाट आरक्षण के मुद्दे पर कांग्रेसनीत यूपीए सरकार पर दबाव बनाने के लिए अपने आवास पर आयोजित बैठक में पार्टी के नेताओं के अलावा संयुक्त जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष एचपी सिंह परिहार, अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के कार्यवाहक अध्यक्ष भगत सिंह दलाल, हरियाणा प्रदेशाध्यक्ष हवा सिंह सांगवान, दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष रणसिंह शौकीन, रालोद महासचिव पुष्पेन्द्र सिंह चौधरी, मेरठ के अमन सिंह व डीएस
वर्मा आदि नेताओं को भी बुलाकर विचार विमर्श किया। चौधरी अजित सिंह ने कांग्रेस के साथ मिलकर जाट आरक्षण पर अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक को इस मुद्दे पर झटका दिया है, जो उत्तर प्रदेश के चुनाव के मद्देनजर समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव के कंधे पर बंदूक चलाकर राजनीति करने के प्रयास में जुटे हुए हैं।

शनिवार, 7 मई 2011

पटरी पर नहीं चढ़ पा रहा कांग्रेस-तृणमूल गठबंधन

ओ.पी. पाल


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारें पर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस दोनों ही अपनी मनमाफिक शर्तो पर अड़िग हैं जिसके कारण कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच बेनतीजा वार्ता से फिलहाल तो पश्चिम बंगाल में दोनों दलों के बीच गठबंधन पटरी पर चढ़ता नजर नहीं आ रहा है। हालांकि दोनों दल के नेता एक-दूसरे के बीच गतिरोध दूर होने की उम्मीद पर कायम हैं।


नई दिल्ली में रविवार को पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव को मिलजुल कर लड़ने के लिए सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी के बीच वार्ता हुई। इस वार्ता में कांग्रेस और तृणमूल एक-दूसरे की मनमाफिक शर्तो को स्वीकार करने को तैयार न होने के कारण यह बातचीत बेनतीजा रही।सीटों के बंटवारे को लेकर अभी तक कांग्रेस और टीएमसी के बीच गतिरोध बना हुआ है। दोनों दलों के बीच मतभेद की पृष्ठभूमि में बताया जा रहा है कि तृणमृल कांग्रेस अपनी सहयोगी पार्टी कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में 294 विधानसभा सीटों में से केवल 58 सीटें देना चाहती है, जबकि कांग्रेस कम से कम 98 सीटों पर चुनाव लड़ने पर अड़िग है। सूत्रों की माने तो कांग्रेस को इस बात पर आपत्ति है कि टीएमसी उसे वो सीटें दे रही है, जहां से कांग्रेस के प्रत्याशी जीत ही नहीं सकते हैं। तमिलनाडु में द्रमुक के साथ गठजोड़ के विवाद से मुक्त हुई कांग्रेस पश्चिम बंगाल में गठजोड़ की राजनीति में फंसती नजर आ रही है। यही नहीं ममता बनर्जी और प्रणव मुखर्जी की बातचीत से पहले टीएमसी के केंद्रीय मंत्री सुल्ताल अहमद और मुकुल राय की पश्चिम बंगाल के कांग्रेस प्रभारी डा. शकील अहमद के बीच पहले दौर की बातचीत भी बेनतीजा रही,जिसमें राज्य के लिए कांग्रेस चयन समिति के प्रभारी जनार्दन पुजारी तथा राज्य में प्रदेश कांग्रेस समिति के अध्यक्ष मानस भुइंयां भी मौजूद थे। राज्य में सीटों के बंटवारे को लेकर बने तकरार के बावजूद दोनों ही दल के नेता कांग्रेस-तृणमूल के नेता इस बात की दुहाई देते नहीं थक रहे हैं कि दोनों दल एक-दूसरे के मजबूत सहयोगी हैं और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सीटों के बंटवारे का विवाद सुलझा लिया जाएगा। पहले दौर की दो घंटे चली औपचारिक बैठक के बाद कांग्रेस-टीएमसी के तकरार के बावजूद कांग्रेस नेता डा. शकील अहमद ने भी उम्मीद जताई कि कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस का गठबंधन मजबूत है और पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनावों में वामदल को शिकस्त देने में सक्षम है। सूत्रों के अनुसार पश्चिम बंगाल में मुद्दा केवल सीटों की संख्या का नहीं है, बल्कि जीतने की योग्यता भी काफी महत्व रखती है। कांग्रेस चाहती है कि दोनों पार्टियों को उन सीटों पर मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए जो उन्होंने पिछले चुनाव में जीती हैं और उन सीटों को भी प्राथमिकता दिया जाना जरूरी है जहां कांग्रेस के उम्मीदवार दूसरे स्थान पर रहे हैँ। ममता बनर्जी के रवैये से क्षुब्ध कांग्रेस के एक नेता का तो यहां तक कहना है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख सार्वजनिक रूप से चाहे कुछ भी कहे, लेकिन वह इन चुनावों में वह वाम दलों के साथ-साथ कांग्रेस को ठिकाने लगाना चाहती है और कांग्रेस को वही सीटें देना चाहती हैं जहां वामदलों का गढ़ है। गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल से कांग्रेस के छह सांसद हैं तो राज्य में 19 विधायक। जबकि तृणमूल कांग्रेस के राज्य में 30 विधायक है। पश्चिम बंगाल में 18 अप्रैल से शुरू होकर छह चरणों में चुनाव होंगे।सरकार की बेरूखी पर बरसे रहमानअल्पसंख्यकों के प्रति सरकार गंभीर नहींअंबानी का आलीशान घर भी वक्फ़ की जमीन परओ.पी. पाल राज्यसभा के उप सभापति के. रहमान खान वैसे तो चर्चा में हिस्सा नहीं ले सकते, लेकिन सदन के सदस्य के रूप में जैसे ही उन्हें सदन में बोलने का मौका मिला तो उन्होंने अल्पसंख्यकों के प्रति केंद्र सरकार के कामकाज पर सरकार पर प्रहार करने में कोई चूक नहीं की। उन्होंने जहां वक्फ़ बोर्ड की जमीन पर अतिक्रमण पर सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े किये, वहीं अल्पसंख्यकों के प्रति बढ़ती केंद्र सरकार की बरूखी पर भी नाराजगी व्यक्त की।राज्यसभा में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालया के कामकाज पर चर्चा में मंगलवार को सदन के सदस्य होने के नाते सदन में बोलते हुए के. रहमान खान ने कहा कि केंद्र रंगनाथ मिश्र समिति की रिपोर्ट पर केंद्र सरकार ने मुसलमानों को आरक्षण देने की सिफारिशों पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया और न ही सच्चर समिति की सिफारिशों को सरकार पूरी तरह से लागू करने के प्रति गंभीर नजर आ रही है। सदन में बतौर सदस्य उन्होंने अपने अधिकार को प्रयोग करते हुए इस महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा में कहा कि अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय पर सभी अल्पसंख्यकों को सामाजिक न्याय दिलाने की जिम्मेदारी है। आरक्षण भेदभाव और असमानता दूर करने पर उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार को आरक्षण के पहलू पर भी विचार करना चाहिये। खान ने कहा कि सरकार ने अल्पसंख्यकों की स्थिति और उनके कल्याण से जुड़ी सच्चर समिति की सिफारिशों को लागू करने में तीव्रता दिखाये, जिसकी सिफारिशों में समान अवसर आयोग और वक्फ विकास निगम गठित करने का उल्लेख भी है। उपसभापति के. रहमान खान ने एक सांसद के नाते वक्फ संपत्ति का मुद्दा भी जोरशोर से उठाते हुए कहा कि वक्फ बोर्ड के पास देश भर में चार लाख एकड़ जमीन पर फैली परिसंपत्तियां हैं। रक्षा विभाग और रेलवे के बाद वक्फ बोर्ड के पास ही देश में सबसे ज्यादा जमीन है, लेकिन दुर्भाग्य से दो लाख एकड़ जमीन पर या तो अतिक्रमण है या फिर वे विवादित है। सदन में उन्होंने खुला आरोप लगया कि मुंबई में उद्योगपति मुकेश अंबानी का आलीशान घर भी वक्फ बोर्ड की संपत्ति पर बना है,तो वहीं कोलकाता रेसकोर्स भी वक्फ की जमीन पर है। वक्फ बोर्ड की संपत्ति को बचाने के लिये सरकार कोई कदम उठाने का प्रयास नहीं कर रही है। खान ने कहा कि वक्फ कानून की धारा 32:5: के तहत वक्फ बोर्ड को अपनी संपत्ति विकसित करने का अधिकार प्राप्त है लेकिन एक व्यापक दृष्टिकोण के अभाव में उसकी संपत्ति पर उचित ध्यान नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि यदि वक्फ अपनी संपत्ति को विकसित कर ले तो वह 10,000 करोड़ रुपये की आमदनी कर सकता है जिसका निवेश मुस्लिम अल्पसंख्यकों की शिक्षा और कल्याण के लिये हो सकता है। हज यात्रा के लिये दी जाने वाली सब्सिडी का मुद्दे पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि वह इस तरह सहायता के औचित्य नहीं है,जबकि इस तरह की सब्सिडी को सुसंगत बनाने की जरूरत है। उन्होंने सरकार को नसीहत दी कि वह देश में अल्पसंख्यक के विकास और कल्याण की योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करे, ताकि अल्पसंख्यक वर्ग के हितों की रक्षा की जा सके।जाट आरक्षण आंदोलनसरकार के आश्वासन पर आंदोलन समाप्त हाने के संकेतआरक्षण के मुद्दे पर अड़े जाटों के प्रतिनिधिमंडल गृह मंत्री पी. चिंदंबरम से मिलाजाट आरक्षण पर निर्णय के लिए सरकार ने मांगा तीन दिन का समयओ.पी. पाल केंद्र की सरकारी नौकरियों में पिछले बारह दिन से चल रहे जाट आंदोलन को खत्म कराने के लिए केंद्र सरकार के बुलावे पर जाट आंदोलनकारी प्रतिनिधिमंडल के साथ वार्ता में केंद्र सरकार ने रेलवे टेÑक जाम के कारण जनता की बढ़ती समस्याओं का वास्ता देते हुए आंदोलन को समाप्त करने की मांग की और आश्वासन दिया कि उनकी मांगों पर निर्णय के लिए सरकार को तीन दिन का समय चाहिए। सरकार के इस आश्वासन के बावजूद जाट आरक्षण आंदोलन बुधवार को भी बादस्तूर जारी रहा और चार दर्जन से अधिक ट्रेने भी निरस्त रही। आंदोलन को समाप्त करने के लिए राष्टÑीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति अपनी कोर ग्रुप की बैठक में निर्णय लेगी। केंद्र सरकार और आंदोलनकारी जाट नेताओं के बीच हुई इस वार्ता के बाद संभावना है कि गुरुवार को आंदोलन स्थगित करने का ऐलान कर दिया जाएगा।सरकारी नौकरियों में ओबीसी कोटे से आरक्षण की मांग को लेकर 12 दिनों से चल रहे जाट आंदोलन पर एक बार फिरसे सरकार का आश्वासन पड़ता नजर आ रहा है। जाट आरक्षण आंदोलन के लगातार उग्र होता देख केंद्र सरकार ने जाटनेताओं को वार्ता के लिए आमंत्रित किया। बुधवार को केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम और केंद्रीय सामाजिक न्याय एवंआधिकारिता मंत्री मुकुल वासनिक के साथ आंदोलनकारी जाट नेताओं के एक 15 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल की साउथब्लाक में करीब एक घंटा वार्ता हुई। गृह मंत्री चिदंबरम ने प्रतिनिधिमंडल के सामने सरकार का रुख रखते हुए जनता की समस्याएं बढ़ने की बात कहते हुए जारी आंदोलन को खत्म करने का अनुरोध किया। वहीं आंदोलनकारियों की मांग पर निर्णय लेने के लिए गृहमंत्री ने तीन दिन का समय मांगा है, जिसके बाद सरकार और आंदोलनकारियों के प्रतिनिधिमंडल के बीच फिर वार्ता होगी। इस आश्वासन के बाद हालांकि जाट नेताओं का रुख नरम नजर आया, लेकिन प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे राष्टÑीय जाट आरक्षण समिति के अध्यक्ष यशपाल मलिक ने सरकार से कहा कि आंदोलन समाप्त करने का निर्णय 15 लोग अकेले नहीं ले सकते इसके लिए आंदोलन के केंद्र काफूरपुर में कोर ग्रुप की बैठक करके निर्णय लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि वह आंदोनल को फिलहाल स्थगित करने का निर्णय नहीं ले सकते, क्योंकि यह दर्द केवल इन 15 लोगों का ही नहीं बल्कि करोड़ों जाटों का है। आंदोलन के दौरान सामने आने वाली समस्याओं के मामले पर समिति के अध्यक्ष मलिक का कहना है कि हम इतने सालों से अपने दर्द के लिए सरकारों से गुहार लगा रहे हैं, हमारा दर्द भी किसी से कम नहीं है। वार्ता के दौरान गृहमंत्री पी. चिदंबरम की ओर से यह बात भी कही गई कि जाट आरक्षण के मसले पर दूसरे मंत्रालयों और विभागों से भी बातचीत करने के लिए कम से कम दो या तीन दिन का समय लगेगा।बुधवार को भी निरस्त रही दर्जनों टेÑनेसरकार के साथा वार्ता के बावजूद आरक्षण की मांग को लेकर जाट समुदायों का आज 12वें दिन में प्रदर्शन जारी है। जाटनेता अपने समर्थकों के साथ रेल पटरियों पर डेरा जमाए हुए हैं। पटरियों में जाट समुदायों के प्रदर्शन की वजह से बुधवार को भी 66 ट्रेनें रद्द की गई हैं, जिनमें गाजियाबाद-मुरादाबाद रूट पर 27 ट्रेनो, दिल्ली-रेवाड़ी रूट पर भी 5 ट्रेनों को रद्द किया गया है। इसके अलावा दिल्ली-भटिंडा रूट पर 24 ट्रेनों को निरस्त किया गया है। रेलवे ने फिरोजपुर-मुंबई सेंट्रल जनता एक्सप्रेस को पहले ही 18 मार्च तक के लिए रद्द रखने का ऐलान किया है। गाजियाबाद-मुरादाबाद रूट पर 2 और दिल्ली-रेवाड़ी रूट पर 4 ट्रेनों को टर्मिनेट किया गया है। वहीं अन्य 19 ट्रेनों के रूट भी बदले गए हैं। इसका असर रोहतक, भिवानी, सिरसा, भिंड, चंडीगढ़, कानपुर, श्रीगंगानगर जाने वाली ट्रेनों पर पड़ा है। पटरियों पर आंदोलनकारियों के कब्जे की वजह से बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश जाने वाली ट्रेनों पर जबरदस्त असर पड़ा है। राजस्थान और हरियाणा जाने वाले मुसाफिर भी परेशान हैं।ममता व प्रणव के बीच बातचीत फिर बेनतीजापश्चिम बंगाल चुनाव: कांग्रेस-तृणमूल गठबंधन पर संशय के बादलओ.पी. पाल पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच विधानसभा चुनाव के ठीक पहले गठबंधन पटरी पर चढ़ने कोतैयार नहीं है। दोनों दलों की हठ के सामने सीटों के बंटवारे पर तृणमूल व कांग्रेस के बीच बुधवार को हुई दूसरे दौर कीबातचीत में भी कोई नतीजा नहीं निकल सका है।देश के पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर जैसे-तैसे तमिलनाडु में तो कांग्रेस और द्रमुक के बीचतलाक होने से बच गया, लेकिन पश्चिम बंगाल में कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर दोस्तीपटरी से उतरती नजर आ रही है और अभी तक दोनों दलों के तालमेल को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई है। पिछलेसप्ताह नई दिल्ली में हुई बातचीत में भी कोई नतीजा नहीं निकल सका था। इसके बाद दोनों दलों को ही उम्मीदवारों कीघोषणा करनी है, लेकिन दोनों ही दलों के गठबंधन परवान नहीं चढ़ पा रहा है। राज्य में सीटों के बंटवारे को लेकरकोलकाता में फिर प्रणब मुखर्जी और ममता बनर्जी के बीच दूसरे दौर की बातचती हुई, लेकिन घंटो तक चली जद्दोजहदके बाद कोई नतीजा सामने नहीं आ सका। दरअसल कांग्रेस को तोड़कर बनी तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल में इतनीमजबूत स्थिति में है कि देश की सबसे बड़ी सियासी पार्टी को गठबंधन के लिए नाको चने चबवा रही है। पश्चिम बंगालमें कांग्रेस जितनी मर्जी पर चुनाव लड़ने का सपना देखना चाहे देख ले, हकीकत में तो वो उतनी ही सीट पर मैदान मेंउतरेगी जितनी पर ममता बनर्जी चाहेंगी। कांग्रेस के दिग्गज प्रणब मुखर्जी सीटों के बंटवारे को लेकर मंगलवार को हीकोलकाता इस उम्मीद के साथ पहुंचे थे कि दीदी से बातचीत के बाद सीटों के बंटवारे पर बातचीत अंतिम निर्णय तकपहुंच जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका है। तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस गठबंधन का सीटों को लेकर चल रही माथापच्ची काविकल्प हालांकि अभी बंद नहीं हुआ है और दोनों ही दल उम्मीदों पर कायम है कि दोनों के बीच सम्मानजनक गठबंधनहोगा, जिससे पश्चिम बंगाल में वामदलों के गढ़ को ध्वस्त किया जा सकेगा। सूत्रों के अनुसार इससे पहले हुई बातचीतमें गत शुक्रवार तक ममता कांग्रेस को 58 सीट देने को तैयार थी, लेकिन कांग्रेस ममता से 100 सीटे मांगते-मांगते अब 68 सीट पर भी समझौता करने को तैयार है, जिससे तृणमूल के हौंसले और भी बुलंद हो गये हैं। तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों के अनुसार कांग्रेस को 62 से ज्यादा सीटें किसी भी कीमत पर नहीं दी जा सकती। हालांकि दोनों ही दल यह दुहाई देने में पीछे नहीं हैं कि राज्य में दोनों दल मिलकर चुनाव लड़ेंगे और दोनों दल इस उम्मीद पर कायम है कि आगे भी दोनों दलों के बीच बातचीत के विकल्प खुलें हैं। सीटों के बंटवारे को लेकर एक या दो दिन में फिर से दोनों दलों के बीच बातचीत होगी, जिसमें उम्मीद है कि कांग्रेस-तृणमूल के बीच मजबूत गठबंधन तय हो जाएगा।विकीलीक्स का खुलासा बेबुनियाद: अजितकिसी भी जांच के लिए तैयार हैं रोलोद प्रमुखओ.पी. पाल विकीलीक्स के खुलासे को राष्टÑीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह ने बेबुनियाद करार देते हुए कहा कि उनकादल पहले से परमाणु करार के खिलाफ था और हमारे तीनों सांसदों ने सरकार के विश्वासमत के खिलाफ वोटकिया जो लोकसभा के दस्तावेजों में दर्ज है। इसलिए राष्टÑीय लोकदल के सांसदों पर लगे आरोपों की वह किसीभी तरह की जांच का सामना करने को तैयार हैं।संसद के दोनों सदनों में विकीलीक्स के खुलासे के बाद हुए विपक्ष द्वारा यूपीए सरकार को चौतरफा घेरते हुएजिस प्रकार का हंगामा हुआ उसे रालोद प्रमुख अजित सिंह अन्य भ्रष्टाचार के मुद्दों को दबाने के प्रयास मेंबेवजह तूल देने का प्रयास मान रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि 22 जुलाई 2008 को यूपीए सरकार के विश्वासमत के खिलाफ उन्होंने राजग व वामदलों के साथ पहले ही अपनी पार्टी की रणनीति तय कर दी थी और रालोदके तीनों सांसदों ने सरकार के खिलाफ वोट किया था, जो लोकसभा अध्यक्ष के रिकार्ड में दर्ज है। चौधरी पूर्वकेंद्रीय मंत्री अजित सिंह ने यह भी कहा कि विकीलीक्स के खुलासे का पहला ही दावा खोखला साबित होता हैकि जिसमें उसने रालोद के चार सांसदों का जिक्र किया है, जबकि 14वीं लोकसभा में उसके केवल तीन हीसांसद थे। बाकी रहा सांसदों को खरीदने का सवाल उनके परमाणु करार के विरोध की नीति के कारण कांग्रेसके किसी भी प्रतिनिधि ने न तो रालोद से संपर्क साधा और न ही उनके सांसद बिकने वाले थे। चौधरी अजितसिंह का मानना है कि कुछ लोगों ने कोई बात कही है और उन्होंने बिना पुष्टि किए जारी कर दिया, जो पूरी तरहबेबुनियाद है। रालोद नेता अजित सिंह ने कहा कि वह इस पूरे मामले में किसी भी तरह की जांच के लिए तैयारहैं। विकीलीक्स की ओर से जारी अमेरिकी राजनयिकों के संवादों में दावा किया गया है कि कांग्रेस नेता सतीशशर्मा के एक सहयोगी ने कथित तौर पर अमेरिकी दूतावास के एक कर्मचारी को ‘नगदी से भरी दो तिजोरी‘दिखाई थीं और कहा था कि परमाणु करार पर संप्रग सरकार के विश्वास मत से पहले कुछ सांसदों का समर्थनपाने के लिए रिश्वत देने के लिहाज से 50-60 करोड़ रुपये तैयार है सभी मनगढंत है। रालोद की पूर्व सांसद श्रीमती अनुराधा चौधरी ने हरिभूमि को बताया कि रालोद पहले से ही परमाणु करार केविरोध में रहा है और वर्ष 2008 में यूपीए सरकार के खिलाफ वोट करने के लिए वह राजग और विपक्ष के साथथे और सरकार के विश्वास मत के खिलाफ ही वोट किया था। उन्होंने कहा कि जिस अखबार में विकीलीक्सके खुलासे के हवाले से रालोद पर आरोप लगाये गये हैं उसने भी रालोद से यह पुष्टि करने का प्रयास नहीं कियाकि कम से कम सांसदों की संख्या की तो पुष्टि कर ली जाए। अनुराधा चौधरी ने कहा कि रालोद के सांसदों परलगाये जा रहे सभी आरोप बेबुनियाद है और इन्हें साबित भी नहीं किया जा सकता, चूंकि सभी संसद के रिकार्डमें उस दौरान रालोद की भूमिका दर्ज है।तृणमूल के साथ कांग्रेस की मजबूरी!आखिर कांग्रेस-तृणमूल में हुआ सीटों का बंटवाराओ.पी. पाल पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के साथ चुनावी गठजोड़ में एक तिहाई सीटें लेने के लिएअड़िग कांग्रेस को तृणमूल कांग्रेस ने केवल 65 सीट देकर समझौते के लिए मजबूर कर दिया है। ऐसे में सवालउठता है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की क्या मजबूरी रही जिसके लिए उसे तृणमूल कांग्रेस के सामने झुकने केलिए मजबूर होना पड़ा है, जबकि इससे पहले तमिलनाडु में कांग्रेस ने द्रमुक पर अपनी मनचाही सीटों पर हीसमझौता करके द्रमुक को झुकने पर मजबूर कर दिया था।संप्रग की सहयोगी तृणमूल कांग्रेस के साथ पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को सीटों के बंटवारे को लेकर तमिलनाडुसे भी कहीं अधिक माथापच्ची करनी पड़ी है, जिसके कारण कांग्रेस और तृणमूल के बीच सीटों के बंटवारे कोलेकर हुई कई दौर की वार्ता बेनतीजा रही। शायद कांग्रेस पश्चिम बंगाल में उसी तरह का दबाव तृणमूल कांग्रेसपर बनाने का प्रयास कर रही थी, जिस प्रकार उसने तमिलनाडु में द्रमुक पर दबाव बना कर अपनी मनमाफिकसीटों पर समझौता कर लिया था। लेकिन पश्चिम बंगाल में राजनीतिक परिस्थिति अलग थी, जिसके कारणतृणमूल कांग्रेस प्रमुख कुमारी ममता बनर्जी कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में अपनी शर्ताे पर ही कांग्रेस के साथचुनावी तालमेल करने की जिद पर अड़िग थी। राजनीतिक विशेषज्ञों की माने तो जिस प्रकार से तमिलनाडु मेंकांग्रेस का हार्डकोर मतदाता होने के कारण द्रमुक को साथ रखने की मजबूरी थी उसी प्रकार से पश्चिम बंगालमें भी उसकी तृणमूल को साथ लेकर चुनावी रणभूमि में उतरना मजबूरी रहा, लेकिन तमिलनाडु की तरह कांग्रेसकी पश्चिम बंगाल में तृणमूल ने एक न चलने दी और ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने अपनी सहयोगीकांग्रेस को पिछले लोकसभा में हुए समझौते को आधार बनाकर सीटों का बंटवारा करने का फार्मूला अपनायाऔर कांग्रेस को तृणमूल की जिद के सामने अपनी एक तिहाई सीटों पर चुनाव लड़ने के अड़िग इरादे कोत्यागना ही पड़ा। हालांकि राज्य में चुनावी तालमेल में कांग्रेस को मिली 65 सीट में तृणमूल कांग्रेस के फार्मूलेके विपरीत करीब 20 सीटें अधिक है। इस चुनावी समझौते का कारण यह भी बताया जा रहा है कि तृणमूलकांग्रेस 294 में से 228 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की सूची पिछले सप्ताह ही जारी कर चुकी थी, जिसके बादकेवल 66 सीट ही शेष रह गई थी। फिर भी कांग्रेस को तृणमूल कांग्रेस के सामने झुकना ही पड़ा है और सीटोंके बंटवारे पर दोनों दलों की सहमति बन गई है जिसमें तृणमूल कांग्रेस 229 और कांग्रेस 65 सीटों पर चुनावलड़ेगी। पिछले दो सप्ताह से पश्चिम बंगाल में सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस के बीच चलरही रस्साकशी को सोमवार को विराम दे दिया गया, जिसकी घोषणा पश्चिम बंगाल के कांग्रेस प्रभारी डा.शकीलअहमद ने एक संवाददाता सम्मेलन में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी सेमुलाकात और मुखर्जी द्वारा तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से फोन पर की बई बातचीत के बाद इससमझौते की घोषाण की। इस चुनावी समझौते पर संतोष जाहिर करते हुए पश्चिम बंगाल के प्रभारी डा. शकीलअहमद ने उम्मीद जताई है कि राज्य में दोनों दलों का गठबंधन वाम दलों के कुशासन को समाप्त करने के लिएबंगाल की जनता को एक मौका देगा। तृणमूल के सामने किसी प्रकार के समर्पण से इंकार करते हुए शकीलअहमद का कहना है कि जब दो दल बातचीत के जरिए किसी समाधान पर सहमत होते हैं तो कहीं न कहीं तोसमझौता करना ही पड़ता है।ऐसे तो नहीं बढ़ेगी नौसेना की समुद्री क्षमता!कैग ने नौसेना के युद्धपोत निर्माण पर उठाये सवालओ.पी. पाल समुद्री सुरक्षा के खतरों से जुड़ी भारतीय नौसेना की भूमिका को कमजोर करने वाली स्वदेशी युद्धपोतों के निर्माण कीयोजनाओं में हो रहे विलंब को गंभीरता से लेते हुए भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानि कैग ने केंद्र सरकार पर सवालिया निशान लगाये हैं। वह भी तब जब भारत नौसेना क्षमता और समुद्री सुरक्षा को सुदृढ़ बनाने का दावा करता आ रहा है।संसद के दोनों सदनों में मंगलवार को पेश की गई भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की एक रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया गया है। भारत को एक बड़ा समुद्रवर्ती देश बताते हुए कैग ने युद्धपोतों के स्वदेशी निर्माण में विलंब को समुद्री खतरे से निपटने के विपरीत एक बेहद गंभीर बीमारी करार देते हुए कहा है कि पिछले कई वर्षो से भारतीय नौसेना में युद्धपोतों का संख्याबल स्थिर रहा है और युद्धपोतों के स्वदेशी निर्माण के बावजूद भारतीय नौसेना अपने निर्धारित स्तर के प्रति बड़ी कमियों का सामना कर रही है। कैग ने खुलासा किया कि इस विलंब के कारण वर्ष 2012 तक भारतीय नौसेना फ्रिगेट, ध्वंसक और कारर्वेटों के लिए परिकल्पित बलस्तरों का केवल 20 प्रतिशत का ही प्रतिधारण कर सकेगी। रिपोर्ट के अनुसार पोतों की सेवा मुक्ति और नए पोतों को शामिल नहीं किए जाने के कारण, विशेष रूप से विध्वंसक पोतों की संख्या निर्धारित संख्या बल के विपरीत केवल 84 पोतों तक गिर गयी है। रिपोर्ट के अनुसार पोत प्लेटफार्मो की औसत आयु जैसी समस्या का भी नौसेना को सामना भी करना पड़ रहा है। पोतों की वांछित संख्या और वर्तमान संख्या के अंतर को पूरा करने के लिए समयबद्ध पोत निर्माण एवं उन्हें शामिल किये जाने पर भी रिपोर्ट में बल दिया गया है। यही कारण है कि सरकार के वे सभी दावे खोखले साबित होते नजर आते हैं जिनके लिए नौसेना की क्षमता को बढ़ाने के लिए युद्धपोतों के निर्माण की योजनाओं को लागू करने के दावे किये जाते रहे हैं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक(कैग) ने अपनी रिपोर्ट में यहां तक कहा कि यह देश की विडम्बना ही है कि ऐसे समय पर यह स्थिति सामने आयी, जब नौसेना की जिम्मेदारियों में उल्लेखनीय वृद्धि हो रही है। कैग ने सरकार को यह भी सुझाव दिया है कि नौसेना की समुद्री क्षमता में उत्पन्न कमी को दूर करने की अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता है। कैग रिपोर्ट के अनुसार युद्धपोत निर्माण अपने आप में एक जटिल, अधिक समय लेने वाली और पुनरावृत्ति प्रक्रिया है, लेकिन फिर भी भारतीय नौसेना के पोत निर्माण परियोजनाओं की विलंब अवधि तथा न्यून अनुमान की मात्रा से एक गंभीर रूग्णता उजागर होती है। कैग ने पी 15 क(ध्वंसक), पी 17(लड़ाकू) और पी 28(एएसडब्ल्यू. कार्बेट) परियोजनाओं के विलंब से पूरा होने या कुछ के बीच में लंबित होने पर कड़ा रुख अपनाते हुए परियोजना प्रबंधन की कमियों का भी खुलासा किया है। कैग ने सरकार से सिफारिश की है कि नौसेना मुख्यालय और रक्षा मंत्रालय में रक्षा लोक सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के प्रोतप्रांगणों द्वारा प्रस्तुत बजट संबन्धी लागतों की शुद्धता के सत्यापन हेतु एक संस्थागत क्रियाविधि अस्तित्व में होनी चाहिए। वहीं सभी पोतप्रांगणों को आधुनिकीकृत करने पर बल देते हुएनौसेना को अपने विक्रेता बेस का विस्तार करने जैसी कई सकारात्मक कदम उठाने की भी संस्तुति की है।करोड़ो का नुकसान झेलने को मजबूर रेलवेजाट आंदोलन ने तोड़ी रेलवे की कमरओ.पी. पाल यूपी व हरियाणा में पिछले करीब 16 दिन से सरकारी नौकरियों में आरक्षण की मांग को लेकर चल रहे जाट आंदोलन के कारण रेलवे को करोड़ो का नुकसान हो रहा है और वहीं रेल यात्रियों को जिस मुश्किलों से गुजरना पड़ रहा है उसकासमाधान अभी तक न तो केंद्र सरकार के पास है और न ही रेलवे के पास। लेकिन इस आंदोलन के कारण रेलवे कोकरोड़ों रुपये का नुकसान हुआ है।सरकारी नौकरियों में ओबीसी वर्ग में आरक्षण की मांग को लेकर गत पांच मार्च से राष्टÑीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति और अन्य संगठनों ने केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन किया हुआ है, जिसमें केंद्र सरकार के साथ दो दौर की वार्ता के बावजूद आंदोलनन समाप्त नहीं हो सका। यूपी में केवल इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर जाट आरक्षण संघर्ष समिति के राष्टÑीय अध्यक्ष यशपाल मलिक के नेतृत्व में मुरादाबाद के काफूरपुर रेलवे टेÑक से आंदोलनकारियों ने कब्जा हटाया है, जबकि हरियाणा में जाट आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलनकारी अभी तक रेलवे टेÑक पर जमे हुए हैं। इस आंदोलन के कारण रेलवे की यात्रियों को दी जाने वाली सभी सुविधाएं काफूर हो रही हैं और यात्रियों को भारी मुश्किलों का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। वहीं रेलवे को इस आंदोलन के कारण करोड़ो रुपये की राजस्व हानि हो रही है। रेलवे ट्रेक पर आंदोलनकारियों के कारण प्रतिदिन सैकड़ो रेलगाड़ियां प्रभावित हो रही है, और दर्जनों को निरस्त करना पड़ रहा है। उत्तर रेलवे के सूत्रों की माने तो पांच मार्च से अब तक 1200 से अधिक मेल, एक्सप्रेस और पैंसेजर टेÑनों को निरस्त करना पड़ा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के बाद उत्तर प्रदेश में तो रेलवे ट्रेक खाली हो गय है, लेकिन हरियाणा में आंदोलनकारी अभी भी रेलवे मार्ग को खाली करने को तैयार नहीं हैं, जिसके कारण दिल्ली-बठिंडा और बीकानेर-जयपुर रेल मार्ग पर भारी असर पड़ा है।जहां तक इस आंदोलन से रेलवे को हो रही राजस्व हानि का सवाल है उसके बारे में रेलवे प्रवक्ता एएस नेगी का कहना है कि जाट आंदोलन की वजह से अब तक 1900 से अधिक ट्रेनें प्रभावित हुईं, जिनमें से 1200 से अधिक ट्रेनें रद्द कर दी गईं। नेगी ने कहा कि 20 मार्च तक के उपलब्ध आंकड़े के अनुसार 1701 गाड़ियां प्रभावित हुईं। इनमें से 1024 को रद्द कर दिया गया और 436 का मार्ग बदलना पड़ा। 241 ट्रेनों का सफर उनके गंतव्य से पहले ही समाप्त कर दिया गया। प्रवक्ता ने कहा कि 20 मार्च के बाद भी हर रोज लगभग 70 ट्रेनें रद्द हो रही हैं, जिससे जाट आंदोलन से प्रभावित गाड़ियों का आंकड़ा और अधिक हो गया है। जाट आंदोलन के चलते रेलवे को करोड़ों का नुकसान हुआ है, लेकिन रेल अधिकारियों का कहना है कि उनके पास अभी इस बारे में कोई आधिकारिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। सबसे अधिक नुकसान सैकड़ों मालगाड़ियों का परिचालन प्रभावित होने से हुआ है। रेलवे को बुधवार को भी 66 ट्रेनें रद्द करनी पड़ी, जबकि मंगलवार को 73 ट्रेनें रद्द की गई थीं।

शनिवार, 26 मार्च 2011

कांग्रेस-तृणमूल में बढ़ी सियासी रार

सीटों के बंटवारे पर टूटने के कगार पर पहुंची दोस्ती
ओ.पी. पाल

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का गठजोड़ सिरे नहीं चढ़ पा रहा है जिसके कारण राज्य में विधानसभा चुनाव को लेकर दोनों दलों में चल रही बातचीत परवान चढ़ती नजर नहीं आती और तृणमूल कांग्रेस अपनी सहयोगी कांग्रेस को उसकी मनमाफिक सीटें देने को तैयार नहीं है।
कांग्रेस के पश्चिम बंगाल के प्रभारी डा. शकील अहमद और कांगे्रस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की हठ के कारण उससे बातचीत करने के लिए पश्चिम बंगाल जाने का कार्यक्रम अंतिम चरणों में स्थगित कर दिया है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस व तृणमूल के बीच सीटो के बंटवारे पर बने संशय इस बात को जाहि कर रहा है कि जितनी सीटें कांग्रेस मांग रही है तृणमूल उसके लिए अभी तक राजी नहीं है। तृणमूल ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को को 58 सीट देने की पेशकश की है, जबकि कांग्रेस एक तिहाही सीटें मांग रही है। कांगे्रस के सूत्रों का कहना है कि एक तिहाही नहीं तो कम से कम कांग्रेस 75 सीटों पर तो चुनाव लड़ना ही चाहेगी, लेकिन इसके लिए भी तृणमूल अभी तक तैयार नहीं हो सकी है। कांग्रेस के सूत्रों की माने तो प्रणव मुखर्जी व डा. शकील अहमद ने अपनी कोलकाता यात्रा स्थगित करके तृणमूल कांग्रेस को यह बताने का प्रयास किया है कि बंगाल में चुनावी तालमेल में 294 में से कांग्रेस के लिए छोड़ी जाने वाली 58 सीट पर्याप्त नहीं है और कांग्रेस को तृणमूल का यह रवैया कतई बर्दाश्त नहीं है। शनिवार को कोलकाता में प्रणव मुखर्जी और डा. शकील अहमद की तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से होने वाली बैठक में सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप दिया जाना था जो तृणमूल के रवैये से कांग्रेस ने स्थगित कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में पिछले लोकसभा में कांग्रेस को 11 सीटें दी गई थी, जिनमें से कांग्रेस छह सीटों पर ही जीत सकी। उसी के आधार पर कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा 62 सीटें दी जा सकती हैं। दूसरी ओर कांग्रेस राज्य में एक तिहाई सीटों पर अपनी किस्मत को अजमाना चाहती है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर बने तकरार को देखते हुए लग रहा है कि तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में तो कांग्रेस अपनी सहयोगी द्रमुक को मनाने में सफल हो गई है,लेकिन पश्चिम बंगाल में तृणमूल को अपनी शर्त पर सीटों का बंटवारा करना एक कठिन डगर दिखाई दे रही है। जाहिर सी बात है कि पश्चिम बंगाल में यदि तृणमूल की हठ कायम रही तो कांग्रेस-तृणमूल की दोस्ती टूट सकती है। शनिवार को कोलकाता में कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस के बीच शनिवार को होने वाली बैठक का मकसद यही था कि सीटों के तालमेल को अंतिम रूप देकर सोमवार को उम्मीदवारों के चयन पर मुहर लगाई जा सकती थी। अब सवाल है कि यदि कांगे्रस-तृणमूल की सीटों पर तालमेल नहीं हो पाता तो क्या कांग्रेस पश्चिम बंगाल में बिहार की तर्ज पर अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी?

आंकड़ो की बाजीगरी से नहीं भरेगा गरीबों का पेट

आम बजट पर चर्चा में बोले प्रभात झा
ओ.पी. पाल

आम बजट पर यूपीए सरकार को चौतरफा घेरते हुए भाजपा के सांसद प्रभात कुमार झा ने कहा कि जनता को आंकडों की बाजीगरी से गरीब की भूख और गरीबों का पेट नहीं भरा जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि देश की 77 फीसदी गरीबी से नीचे जीवन यापन कर रहे परिवारों के लिए इस बजट में कुछ भी नहीं है। इसलिए आम बजट में प्रधानमंत्री और गठबंधन की मजबूरी साफ झलक रही है।
मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद प्रभात कुमार झा शुक्रवार को सदन में आम बजट पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए बोल रहे थे। सदन में उन्होंने बजट पर प्रकाशित एक कार्टून का उदाहरण देते हुए कहा कि इस बजट में अमीरों को छोड़कर सभी वर्गो को आंसू रूलाया गया है। वित्त मंत्री को इंगित करते हुए उन्होंने कहा कि इस बजट में गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले 77 फीसदी लोगों के लिए कुछ भी नहीं दिया गया है। वहीं देश में 20-25 रुपये की मजदूरी करने वाले 52 करोड़ लोगों और 15 कुपोषित वर्ग को सरकार ने इस बजट में कुछ भी नहीं दिया है। उन्होंने कहा कि भूमंडलीय विश्व में तमाम अनिश्चितताओं और तेजी से हो रहे परिवर्तनों के बीच आ रही चुनौतियों के बारे में कहा कि ऐसे में देश की जनता सामने आंकड़ो की बाजीगरी से सरकार गरीब की भूख और गरीब के पेट भरने वाला नहीं है। सरकार खाद्य सुरक्षा कानून बनाने की बात करती है, लेकिन बजट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं किया गया है। प्रभात झा ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में अलग-अलग भयंकर बीमारियों से ग्रसित लोगों के आंकड़े देते हुए कहा कि उनके लिए भी बजट में कुछ नहीं दिया गया। महिला, किसान और नौजवानों के लिए भी बजट में हिस्सा नहीं है तो वह सरकार से सवाल करते हैं? कि चौतरफा घोटालों और भ्रष्टाचार से घिरी यूपीए सरकार ने क्या आम बजट की की परंपरा का निर्वाह किया है? मध्य प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में किसानों की ताकत बढ़ाने के साथ उन्हें ऋण देने की घोषणा की तुलना में देश का बजट खास लोगों के लिए पेश किया गया है। देश में बढ़ती महंगाई के लिए यूपीए सरकार का उच्च विकास दर को दोषी ठहराना ही काफी नहीं है, जों अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के आंकड़ों से भी साबित हो रहा है। उन्होंने कहा कि सच तो यह है कि इस समय भारत में जो महंगाई का दौर चल रहा है उसका मूल उच्च विकास दर नहीं, बल्कि खाद्य पदार्थो की मूल्य दर बढ़ने का कारण महंगाई है जिसे सरकार रोकने में विफल रही। सरकार की मनरेगा योजना पर हमला बोलते हुए प्रभात झा ने कहा कि इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार ने महात्मा गांधी के नाम को भी बदनाम करने का काम किया है, जिसमें इस योजना के नाम पर लूट खसोट चल रही है। सरकार के दावे के विपरीत आम बजट पोल खोल रहा है कि दलितों व आदिवासियों के लिए बजट में कुछ भी नहीं दिया गया है। देश की हालत क्या है यह सभी के सामने है केवल केंद्र सरकार स्वास्थ्य सेवाओं की बात कर ती है, लेकिन इस सेवा पर जीडीपी का एक प्रतिशत ही खर्च करती है। इसके लिए उन्होंने विश्व बैंक के एक आकलन का भी हवाला दिया। पिछले दो सालों से नेशनल डीजीज प्रोग्राम के अंतर्गत बजट आवंटन के लिए 14 प्रतिशत कटौती को प्रभात झा ने शर्मनाक करार देते हुए कहा कि यही कारण है कि देश में स्वास्थ्य सेवा पूरी तरह से चरमराई हुई है। उन्होंने सरकार से स्वास्थ्य सेवा कर को वापस लेने की मांग की। उन्होंने विभिन्न घोटालों और भ्रष्टाचार के अलावा विदेशों में जमा कालेधन पर भी यूपीए सरकार पर तीखे प्रहार करते हुए सरकार को चेताया कि देश को मजबूत बनाने के लिए बजट भी मजबूत होना जरूरी है।

बंगाल समेत पांचों विधानसभा दागियों से लबरेज!

तमिलनाडु व केरल में हैं सबसे ज्यादा आपराधिक विधायक
ओ.पी. पाल
पश्चिमी बंगाल समेत देश के जिन पांच राज्यों में अगले महीने विधानसभा चुनाव होने हैं उन विधानसभाओं में दागियों की कमी नहीं है, और सभी पांचों राज्यों में आपराधिक छवि वाले विधायकों की संख्या 204 है, जिसमें केरल और तमिलनाडु में सर्वाधिक दागी विधायक शामिल हैं।
केंद्रीय चुनाव आयोग लगातार चुनावी प्रक्रिया को निष्पक्ष और स्ततंत्र बनाने की कवायद में लगातार राजनीतिक दलों के साथ माथापच्ची करता आ रहा है। इसी प्रयास में चुनाव आयोग ने तमिलनाडु, पुडुचेरी, केरल, असम और पश्चिम बंगाल में आगामी अप्रैल और मई माह में होने वाले चुनावों की तैयारी के लिए भी सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के साथ बैठक करके चुनावों में धनबल और अपराधीकरण से दूर रखने की अपील की है। हालांकि सभी राजनीतिक दल राजनीति को आपराधिकरण से दूर रखने की दुहाई देते हैं लेकिन उम्मीदवारों के चयन में सभी बड़े व छोटे दल आपराधिक छवि वाले व्यक्ति को अपना उम्मीदवार बनाने में कतई पीछे नहीं है। नेशनल इलेक्शन वॉच और एडीआर देश में होने वाले चुनावों में उम्मीदवारों को लेकर सर्वेक्षण करती आ रही है, जिसने चुनाव आयोग के साथ मिलकर निष्पक्ष, स्वस्थ्य और लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया के लिए अनेक अभियान भी चलाये हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के राष्ट्रीय समन्वयक अनिल बैरवाल ने उक्त पांचों राज्यों के इलेक्शन वॉच समन्वयको से सर्वेक्षण के बाद मिली रिपोर्ट के बाद बताया कि पांचों राज्यों में कुल 824 विधायकों में से 813 विधायकों के वर्ष 2006 में हुए चुनाव के लिए उम्मीदवारों द्वारा दाखिल शपथपत्रों को अध्ययन किया गया है, जिसमें से 204 विधायक ऐसे हैं जिनकी छवि आपराधिक हैं। इसमें केरल में 140 में से 69, तमिलनाडु में 234 में से 77, पुडुचेरी में 30 में से छह, पश्चिम बंगाल में 294 में से 45 तथा असम में 126 में से सात विधायक दागियों की सूची में शामिल हैं। 204 दागियों में 83 विधायक ऐसे हैं जिनके खिलाफ संगीन मामले लंबित हैं। ऐसे संगीन मामलों में शामिल विधायकों में केरल में 18, तमिलनाडु में 25, पुडुचेरी में पांच, पश्चिम बंगाल में 30 तथा असम में पांच का आंकड़ा सामने आया है। जहां तक धनाढ्य विधायकों का सवाल है उसमें पुडुचेरी का प्रतिशत सबसे ज्यादा है, जिसमें 30 में से नौ विधायक करोड़पतियों की फेरहिस्त में शामिल हैं। तमिलनाडु में 57, असममें 16, केरल में आठ, तथा पश्चिम बंगाल में सात समेत पांचों राज्यों में कुल 97 विधायक करोड़पति हैं। वहीं पांचों राज्यों में कुल मिलाकर 79 महिला विधायकों का प्रतिशत 9.5 है, जिसमें केरल में सात, तमिलनाडु में 22, असम में 13 तथा पश्चिम बंगाल में 37 महिलाएं विधानसभा में प्रतिनिधित्व कर रही हैं।