शनिवार, 26 मार्च 2011

कांग्रेस-तृणमूल में बढ़ी सियासी रार

सीटों के बंटवारे पर टूटने के कगार पर पहुंची दोस्ती
ओ.पी. पाल

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का गठजोड़ सिरे नहीं चढ़ पा रहा है जिसके कारण राज्य में विधानसभा चुनाव को लेकर दोनों दलों में चल रही बातचीत परवान चढ़ती नजर नहीं आती और तृणमूल कांग्रेस अपनी सहयोगी कांग्रेस को उसकी मनमाफिक सीटें देने को तैयार नहीं है।
कांग्रेस के पश्चिम बंगाल के प्रभारी डा. शकील अहमद और कांगे्रस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की हठ के कारण उससे बातचीत करने के लिए पश्चिम बंगाल जाने का कार्यक्रम अंतिम चरणों में स्थगित कर दिया है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस व तृणमूल के बीच सीटो के बंटवारे पर बने संशय इस बात को जाहि कर रहा है कि जितनी सीटें कांग्रेस मांग रही है तृणमूल उसके लिए अभी तक राजी नहीं है। तृणमूल ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को को 58 सीट देने की पेशकश की है, जबकि कांग्रेस एक तिहाही सीटें मांग रही है। कांगे्रस के सूत्रों का कहना है कि एक तिहाही नहीं तो कम से कम कांग्रेस 75 सीटों पर तो चुनाव लड़ना ही चाहेगी, लेकिन इसके लिए भी तृणमूल अभी तक तैयार नहीं हो सकी है। कांग्रेस के सूत्रों की माने तो प्रणव मुखर्जी व डा. शकील अहमद ने अपनी कोलकाता यात्रा स्थगित करके तृणमूल कांग्रेस को यह बताने का प्रयास किया है कि बंगाल में चुनावी तालमेल में 294 में से कांग्रेस के लिए छोड़ी जाने वाली 58 सीट पर्याप्त नहीं है और कांग्रेस को तृणमूल का यह रवैया कतई बर्दाश्त नहीं है। शनिवार को कोलकाता में प्रणव मुखर्जी और डा. शकील अहमद की तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से होने वाली बैठक में सीटों के बंटवारे को अंतिम रूप दिया जाना था जो तृणमूल के रवैये से कांग्रेस ने स्थगित कर दिया है। तृणमूल कांग्रेस के सूत्रों का मानना है कि पश्चिम बंगाल में पिछले लोकसभा में कांग्रेस को 11 सीटें दी गई थी, जिनमें से कांग्रेस छह सीटों पर ही जीत सकी। उसी के आधार पर कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा 62 सीटें दी जा सकती हैं। दूसरी ओर कांग्रेस राज्य में एक तिहाई सीटों पर अपनी किस्मत को अजमाना चाहती है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर बने तकरार को देखते हुए लग रहा है कि तमिलनाडु विधान सभा चुनाव में तो कांग्रेस अपनी सहयोगी द्रमुक को मनाने में सफल हो गई है,लेकिन पश्चिम बंगाल में तृणमूल को अपनी शर्त पर सीटों का बंटवारा करना एक कठिन डगर दिखाई दे रही है। जाहिर सी बात है कि पश्चिम बंगाल में यदि तृणमूल की हठ कायम रही तो कांग्रेस-तृणमूल की दोस्ती टूट सकती है। शनिवार को कोलकाता में कांग्रेस व तृणमूल कांग्रेस के बीच शनिवार को होने वाली बैठक का मकसद यही था कि सीटों के तालमेल को अंतिम रूप देकर सोमवार को उम्मीदवारों के चयन पर मुहर लगाई जा सकती थी। अब सवाल है कि यदि कांगे्रस-तृणमूल की सीटों पर तालमेल नहीं हो पाता तो क्या कांग्रेस पश्चिम बंगाल में बिहार की तर्ज पर अकेले दम पर चुनाव लड़ेगी?

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