शनिवार, 12 मार्च 2011

जीपीएस प्रणाली से ही रोके जा सकेंगे रेल हादसे

रेल बजट में सुरक्षा व संरक्षा में तकनीक की घोषणा की संभावना
ओ.पी. पाल

देश में होने वाले रेल हादसों को रोकने के लिए भारतीय रेलवे दावे तो विकसित देशों की रेल देने की करता आ रहा है लेकिन वित्तीय संकट से जूझ रहा भारतीय रेल रेलवे लाइनों पर इलैक्ट्रानिक लेजर यनि जीपीएस आधारित ट्रेन सुरक्षा एवं चेतावनी प्रणालियां भी अभी तक लागू नहीं कर पाया है। इससे जाहिर है कि भारतीय रेलवे की हालत बिना निवेशकों के सुधरने वाली नहीं है।
भारतीय रेलवे हर साल बजट में आम आदमी को रेल संबन्धी हर सुविधाएं देने की बात करने में भी पीछे नहीं रहा है, लेकिन रेलवे की माली हालत और रॉलिंग स्टाक जैसे संसाधनों की कमी से लगातार जूझ रहा है। भारतीय रेलवे के सामने सुरक्षा और संरक्षा एक बड़ी चुनौती है, जिसके लिए रेलवे लाइनों पर इलैक्ट्रानिक लेजर पर आधारित ट्रेन सुरक्षा एवं चेतावनी प्रणालियों को लागू तो करना चाहता है लेकिन संसाधनों की कमी उसके आड़े आ रही है। पिछले रेल बजट के दौरान भी रेल मंत्री ममता बनर्जी ने रेल सुरक्षा और संरक्षा पर अधिक ध्यान देने पर बल दिया था, लेकिन इसके बाद जिस प्रकार से देश में रेल हादसे हुए हैं वे सभी भारतीय रेलवे के लिए सबक हो सकते हैं कि वह शीघ्र ही रेलवे विकसित देशों की तर्ज पर रेल हादसों को रोकने के लिए इस बार के रेल बजट में रेल मंत्री कोई घोषणा कर सकती है। यह भी नहीं है कि ममता बनर्जी इसके प्रति गंभीर नहीं है वह रेलवे में व्याप्त समस्याओं और तकनीकी मामलों को लेकर केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया से भी चर्चा कर चुकी हैँ। लेकिन अभी तक देखने में यही रहा है कि भारतीय रेलवे लगातार आधुनिक तकनीक की दुहाई देकर रेल हादसों को नियंत्रित करने के प्रयास करने का दावा करता रहा है। रेल बजट के दौरान जो भी रेल मंत्री आया है उसी ने बड़ी-बड़ी घोषणाएं करके अपने से पहले रेल मंत्री से ज्यादा जनता की वाहवाही लूटने का प्रयास किया। जहां तक रेल मंत्री कुमारी ममता बनर्जी का सवाल है यूपीए-2 सरकार में आगामी रेल बजट उनके लिए तीसरा होगा, जिसमें जाहिर सी बात है कि उनकी नजर पश्चिमी बंगाल के विधानसभा चुनाव पर होगी। यह तो ममता बनर्जी पिछले साल के रेल बजट के सामने भी कह चुकी हैँ कि वक्त की पाबंदी को रेलवे का मूलमंत्र समझना चाहिए, लेकिन यह मूलमंत्र सार्थक साबित नहीं हो पा रहा है जिसकी चिंता रेलवे के समस्त महकमें को है। सुरक्षा और संरक्षा के मामले में यदि रेलवे विकसित देशों की तर्ज पर रेल हादसों को रोकने के लिए जीपीएस आधारित टेÑन सुरक्षा एवं चेतावनियां प्रणाली लागू करता है तो उसके लिए करीब 15 हजार करोड़ से भी ज्यादा रकम खर्च होने का अनुमान है, लेकिन इस बजट को अभी तक ममता बनर्जी समेत किसी भी रेल मंत्री ने खर्च करने का प्रयास नहीं किया, भले ही रेल हादसों में मुआवजे के रूप में करोड़ो की राशि देनी पड़ती रही हो और हो भी यही रहा है। पिछले 16-17 सालों में इससे कहीं अधिक की धनराशि रेल हादसों के दौरान रेलवे का खर्च हो चुका है। रेलवे की लचर होती सुरक्षा और संरक्षा नीति को सुधारने के लिए पूरे देश की नजर रेल मंत्री ममता बनर्जी के 25 फरवरी को पेश किये जाने वाले रेल बजट पर टिकी है कि वे इसकी गंभीरता को देखते हुए घोषणा करके लोगों की उम्मीदों पर खरा उतर सके। रेलवे ने माली हालत को सुधारने के लिए जो सार्वजनिक निजी भागीदारी को तरजीह देनी शुरू की है उससे शायद रेलवे और अधिक निवेशकों को बढ़ावा देकर भारतीय रेलवे के इतिहास में कोई नया पन्ना जोड़ सके। यह बात को पहले भी स्वयं रेल मंत्री ममता बनर्जी भी स्वीकर कर चुकी हैं कि रेलवे का सुधार और उसकी वित्तीय हालत को सुधारने के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी बेहद जरूरी है। इसके अलावा रेलवे को निजी निवेश को बढ़ावा देकर देश में यातायात सुविधाओं, नई रेलवे लाइन बिछाने, दोहरीकरण, आमान परिवर्तन, रोलिंग स्टाक की खरीद, तकनीक उन्नयन, हाईस्पीड कॉरिडोर का निर्माण करने, बिजली संयंत्रों की स्थापना करना और यात्रियों की सुविधाओं के लिए बुनियादी ढांचे कोऔर अधिक मजबूत करने की जरूरत है।

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