सोमवार, 24 जनवरी 2011

काले धन को भूल जाए भारत!

लिश्टेनश्टाइन के इंकार से सरकार की मुश्किलें बढ़ी
ओ.पी. पाल
काले धन को भूल जाए भारत! स्विट्जरलैंड की ओर से भारत को काले धन पर किसी प्रकार की जानकारी उपलब्ध कराने से साफ इंकार करने का तात्पर्य तो यही है। जबकि काले धन पर सुप्रीम कोर्ट के साथ विपक्ष की आलोचनाओं से घिरी केंद्र की यूपीए सरकार इस धन को वापस लाने की रणनीति बनाने की कवायद में जुटी हुई है। लिश्टेनश्टाइन ने भारत और स्विट्जरलैंड के बीच ऐसी कोई संधि न होने का हवाला देते हुए भारत को अपने यहां जमा काले धन के बारे में कोई भी जानकारी साझा से इंकार करने से यूपीए सरकार की मुश्किलें ओर बढ़ गई हैं।विदेशों में जमा काले धन के मुद्दे पर यूपीए सरकार चौतरफा घिरी है जिस उच्चतम न्यायालय ने भी सरकार को नसीहत दी है, वहीं विपक्षी राजनीतिक दलों की आलोचनाओं से घिरी केंद्र सरकार काले धन के मुद्दे पर चक्रव्यहू से बाहर निकलने के लिए रणनीति बनाने में जुटी हुई है। इसका कारण साफ है कि सरकार को स्विस बैंकों और कर चोरों के अन्य पनाहगाह देशों में बड़ी मात्रा में रखी गयी राशि को लेकर उच्चतम न्यायालय तथा विपक्ष की आलोचनाओं ने चौतरफा घेरा हुआ है। वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी काले धन को वापस लाने तथा धन के अवैध प्रवाह को रोकने के लिये नियामकीय और कर नियमों के बारे में संप्रग सरकार द्वारा उठाये जाने वाले कदमों के बारे में शीघ्र सरकार की नीति की घोषणा कर सकते हैं। जहां सरकार काले धन के चक्रव्यूह में फंसने के कारण उससे बाहर निकलने का प्रयास कर ही है तो दूसरी ओर यूरोप के छोटे से देश लिश्टेनश्टाइन के उस बयान ने केंद्र की यूपीए सरकार की रणनीतियों पर पानी फेरते हुए उसकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। अब सवाल है कि काले धन कैसे बेदाग होगा भारत? जबकि देशभर में काले धन को लेकर भले ही बहस छिड़ी है लेकिन वर्ष 2012 तक उसे इस बारे में स्विट्जरलैंड से कोई जानकारी नहीं मिलने वाली नहीं है। लिश्टेनश्टाइन ने तो साफ कह दिया है कि वह अपने यहां जमा काले धन पर भारत को कुछ नहीं बताएगा। इस बयान में भारत और स्विट्जरलैंड के बीच ऐसी कोई संधि न होने का हवाला भी दिया गया है, जिसके आधार पर बैंकों में जमा रकम के बारे में एक दूसरे देश को जानकारी दी जा सके। यदि दोनों देश चाहेंगे भी तो इस साल के आखिर तक ही यह संधि बन पाएगी और संसदों तथा दूसरे संगठनों से पुष्टि होने में भी इसे काफी वक्त लगेगा। हालाकि स्विस बैंकों में काला धन रखने वाले भारतीयों के नामों की जानकारी शायद ही बाहर आ पाए, क्योंकि प्रस्तावित संधि में इसके लिए जगह नहीं रखी गई है। पिछले कई सालों से ऐसी रिपोर्टें आती रही हैं कि कुछ रईस भारतीयों ने कई सौ अरब डॉलर स्विस बैंकों में रखे हुए हैं। हालांकि आंकड़े अभी तक सामने नहीं आए हैं और किसी को नहीं पता कि भारतीय नागरिकों का कितना पैसा स्विट्जरलैंड के बैंकों में रखा है। विदेश मामलों के जानकारों का तो मानना है कोई जरूरी नहीं कि स्विस बैंकों में भारतीय नागरिकों का सभी पैसा गैरकानूनी ही हो। इससे पहले भारत के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी और स्विट्जररलैंड के फेडरल काउंसिलर मिचेलिन काल्मी-रे ने अगस्त 2010 में एक प्रोटोकॉल पर दस्तखत किए हैं, जिसके तहत दोहरी टैक्स पॉलिसी का जिक्र किया गया है, लेकिन यह अभी तक लागू नहीं है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद कहा था कि विदेशी बैंकों से काले धन को वापस लाने का काम चुटकियों में नहीं किया जा सकता। लेकिन यूपीए सरकार की मुश्किलें काले धन को लेकर कम होती नजर नहीं आती।

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