सोमवार, 31 जनवरी 2011

कांग्रेस की गठबंधन योजना आसान नहीं!

पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु में भी है उलझन
ओ.पी. पाल

कांग्रेस पार्टी पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु समेत पांच राज्यों में अपनी राजनीतिक जमीन तलाशने के लिए आगामी विधानसभा चुनाव को यूपीए के सहयोगी दलों और अन्य क्षेत्रीय राजनीतिक दलों से गठबंधन करने की कवायद तो कर रही है, लेकिन राज्यों में मुख्य राजनीतिक दलों के साथ तालमेल करने का मुद्दा इतना आसान नहीं है जितना कांग्रेस मानकर चल रही है।
देश के पांच राज्यों में आने वाले समय में विधानसभा चुनाव होने हैं जिसके लिए पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के अलावा केरल, असम और पुडुचेरी में होने वाले चुनावों में कांग्रेस पार्टी अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को हासिल करने के लिए खासकर यूपीए घटकों के साथ तालमेल की रणनीति तैयार कर रही है, लेकिन कांग्रेस के सामने ऐसे बहुत से कारण इस कवायद को पेचीदा बना रहे हैं जिसमें कांग्रेसनीत यूपीए सरकार विपक्ष के साथ अपने सहयोगियों से भी घिरी हुई है। इसलिए कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु समेत देश के पांच राज्यों में आगामी विधानसभा चुनावों के लिहाज से क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन पर कांग्रेस की तस्वीर पूरी तरह से धुंधली है। जहां तक पश्चिम बंगाल का सवाल है वहां कुमारी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस एक तरह से खुद को प्रमुख पार्टी के रूप में चुनाव मैदान में आने का तानाबाना बुन चुकी है, जो कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर अभी तक अपनी स्थिति को स्पष्ट नहीं कर सकी है। हालांकि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख कुमारी ममता बनर्जी ने पिछले सप्ताह ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात तो की थी, लेकिन उसमें किन मुद्दों पर चर्चा हुई इसका खुलासा अभी तक नहीं हो पाया। जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में गठजोड़ की तस्वीर साफ नहीं है। सूत्रों के अनुसार पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस यदि कांग्रेस से गठबंधन करती भी है तो उसके लिए कांग्रेस की योजना के तहत सीटें छोड़ने को ममता कतई तैयार नहीं है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस का मकसद माकपा को मात देकर राज्य की सत्ता पर काबिज होना है। ऐसे में यहां कांग्रेस की स्थिति पेचीदा ही कही जा सकती है। वहीं दूसरी ओर 2जी स्पेक्ट्रम मामले को लेकर दुविधा में फंसी करुणानिधि की द्रमुक से भी तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का गठजोड़ हो सके इसकी संभावनाएं कहीं तक भी नजर नहीं आ रही है। हालांकि कांग्रेस मानकर चल रही है कि तमिलनाडु में उनकी पार्टी के पास द्रमुक नीत गठजोड़ में शामिल होने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, लेकिन 2जी स्पेक्ट्रम मुद्दे पर कांग्रेस व द्रमुक के बीच दरार महसूस की जा रही है। सूत्रों के अनुसार तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि भी दिल्ली आ रहे हैं और वह अपने प्रदेश में गठबंधन पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से विचार विमर्श करेंगे। पिछले दिनों चेन्नई दौरे पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा कांग्रेस-द्रमुक गठबंधन को मजबूत करार देने के बावजूद तमिलनाडु के कांग्रेस नेता निजी तौर पर अकेले चुनाव में कूदने की भी बात कर रहे हैं, लेकिन कांग्रेस बिहार विधान सभा चुनाव से सबक लेने के बाद गठबंधन पर अधिक फोकस कर रही है। चूंकि द्रमुक केंद्र की यूपीए सरकार में तीसरी सबसे बड़ी घटक पार्टी है इसलिए कांग्रेस राज्य में अन्य किसी गठजोड़ से पहले द्रमुक को ही तरजीह देना चाहती है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता की माने तो कांग्रेस नेतृत्व केंद्र सरकार को बहुमत में रखने के लिए तमिलनाडु में द्रमुक के साथ ही रहना पसंद करेगी। इन दोनों राज्यों के अलावा केरल, असम और पुडुचेरी में भी विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं, जिनमें से केरल में कांग्रेस समान विचार वाले दलों के यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की अगुवाई कर रही है और गत लोकसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बाद गठजोड़ इस बार काफी उत्साह में है। प्रदेश में इस गठजोड़ का चिर प्रतिद्वंद्वी सत्तारुढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट है। जबकि पुडुचेरी में कांग्रेस अपने दम पर सत्ता में है वहीं असम में यह बोडो दल के समर्थन से राज कर रही है। कांग्रेस के सूत्रों ने ऐसे भी संकेत दिये हैं कि इन तीनों राज्यों में कांग्रेस अकेले दम पर भी चुनाव मैदान में आ सकती है।

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